कोर्ट ने निचली अदालत के दिए आदेश टीआई सहित करीब 100 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश निरस्त, बहुचर्चित प्रकरण में आगर पुलिस को बड़ी राहत
यह वही प्रकरण है, जिसने निचली अदालत के आदेश के बाद न केवल आगर-मालवा और राजस्थान, बल्कि मध्यप्रदेश तथा राजस्थान की सीमाओं से बाहर भी व्यापक चर्चा बटोरी थी। थाना प्रभारी सहित बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश ने प्रशासनिक, पुलिस एवं विधिक हलकों में हलचल पैदा कर दी थी। मामला सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हुआ था और इसे लेकर विभिन्न स्तरों पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। ऐसे में अब एडीजे कोर्ट द्वारा आदेश अपास्त किए जाने के बाद इस पूरे प्रकरण की दिशा ही बदलती नजर आ रही है।
प्रकरण के अनुसार, घाटाखेड़ी निवासी हमीद खान की ओर से अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, चौमहला के समक्ष एक परिवाद प्रस्तुत किया गया था। परिवाद पर विचार करते हुए निचली अदालत ने कोतवाली थाना प्रभारी आगर शशि उपाध्याय, निरीक्षक रूपसिंह बैस, उप निरीक्षक राखी गुर्जर, एएसआई अजय जाट, आरक्षक शुभम जोशी, राहुल विश्वकर्मा सहित करीब 100 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज करने के दो पृथक आदेश पारित किए थे। इन आदेशों के अनुपालन में राजस्थान के डग थाने में प्रकरण भी पंजीबद्ध कर लिया गया था।
उल्लेखनीय है कि यह पूरा विवाद उस कार्रवाई से जुड़ा है, जिसमें जनवरी 2026 में आगर पुलिस ने राजस्थान के घाटाखेड़ी क्षेत्र में दबिश देकर मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार किया था तथा करोड़ों रुपए मूल्य का मादक पदार्थ जब्त किया था। जिस कार्रवाई को सामान्यतः कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता माना जा रहा था, वही बाद में पुलिस के लिए गंभीर कानूनी चुनौती का कारण बन गई।
निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए सभी आरोपित पुलिसकर्मियों की ओर से अपर सत्र न्यायालय, भवानीमंडी, जिला झालावाड़ के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत की गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अभिभाषक हरिश खंडेलवाल ने विस्तार से पक्ष रखते हुए न्यायालय को अवगत कराया कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित आदेश विधि के अनुरूप नहीं हैं तथा लोकसेवकों के विरुद्ध अभियोजनात्मक कार्रवाई के लिए जो वैधानिक प्रक्रिया और संरक्षण अपेक्षित हैं, उनका समुचित पालन नहीं किया गया। यह भी प्रतिपादित किया गया कि संबंधित पुलिसकर्मी अपने शासकीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए मादक पदार्थ तस्करी के विरुद्ध कार्रवाई कर रहे थे, अतः उनके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज करने से पूर्व आवश्यक विधिक परीक्षण और प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि परिवाद ऐसे पक्ष की ओर से प्रस्तुत किया गया, जिसका संबंध उस कार्रवाई से प्रभावित आरोपित पक्ष से बताया गया है। इस आधार पर परिवाद की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और मंशा पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए गए तथा यह प्रतिपादित किया गया कि परिवाद दुर्भावना और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर प्रस्तुत किया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने प्रकरण के तथ्यों, पुलिस कार्रवाई की परिस्थितियों तथा लोकसेवकों के संबंध में लागू वैधानिक प्रावधानों का पर्याप्त परीक्षण किए बिना आदेश पारित कर दिए।
मामले की सुनवाई के बाद अपर सत्र न्यायाधीश राजीव दत्तात्रेय ने सभी पक्षों को सुनने के उपरांत निगरानी याचिका स्वीकार कर ली। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित 11 जून 2026 के मूल आदेश तथा 15 जून 2026 के संशोधित आदेश में तथ्यों का समुचित परीक्षण नहीं किया गया था। साथ ही, विभिन्न वैधानिक प्रावधानों तथा विधिक प्रक्रिया के आवश्यक तत्वों का पर्याप्त अनुपालन भी नहीं पाया गया। इन्हीं आधारों पर एडीजे कोर्ट ने दोनों आदेशों को अपास्त कर दिया।
अभिभाषक हरिश खंडेलवाल के अनुसार, जब एफआईआर दर्ज कराने के मूल आदेश ही न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं, तब डग थाने में दर्ज एफआईआर स्वतः ही क्षीण हो जाएगी। न्यायालय के इस निर्णय को न केवल प्रकरण में आरोपित पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि इसे पुलिस बल के मनोबल से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, निचली अदालत के आदेश के बाद यह मामला लंबे समय तक सुर्खियों में बना रहा। एक ओर पुलिस कार्रवाई के औचित्य, अधिकार-क्षेत्र और प्रक्रिया को लेकर बहस छिड़ी रही, तो दूसरी ओर सोशल मीडिया पर भी इस प्रकरण को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं। अब जब उच्चतर न्यायालय ने निचली अदालत के आदेशों को अपास्त कर दिया है, तब आगर पुलिस महकमे में राहत का वातावरण दिखाई दे रहा है। पुलिस बल से जुड़े लोगों के बीच यह भावना भी उभरकर सामने आ रही है कि विधिक परीक्षण के बाद न्यायालय से मिली इस राहत ने उनके मनोबल को नई मजबूती दी है।
मादक पदार्थ तस्करी के विरुद्ध की गई कार्रवाई को लेकर खड़े हुए इस बहुस्तरीय विवाद में एडीजे कोर्ट का यह आदेश फिलहाल निर्णायक महत्व का माना जा रहा है। इससे न केवल प्रकरण की न्यायिक दिशा परिवर्तित हुई है, बल्कि यह संदेश भी गया है कि लोकसेवकों के विरुद्ध कार्रवाई के मामलों में विधिक प्रक्रिया, तथ्यों की सम्यक समीक्षा और वैधानिक प्रावधानों का पालन सर्वोपरि है। आगर पुलिस के लिए यह आदेश केवल राहत भर नहीं, बल्कि उस कार्रवाई की वैधानिक पृष्ठभूमि को बल देने वाला निर्णय भी माना जा रहा है, जिसने एक समय पूरे क्षेत्र में व्यापक चर्चा और विवाद को जन्म दिया था।
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